अंकिता भंडारी प्रकरण के बीच ‘जेनी’ की एंट्री से उत्तराखंड की सियासत में हलचल, हरक सिंह रावत पर फिर उठे सवालअसम से देहरादून पहुंचीं जेनी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से लगाई न्याय की गुहार, सीबीआई जांच दोबारा कराने और बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग का दावा

उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर जेनी प्रकरण चर्चा के केंद्र में आ गया है। अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर प्रदेश में जारी राजनीतिक बहस के बीच असम से जेनी के देहरादून पहुंचने और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से न्याय की गुहार लगाने की खबर ने पुराने मामले को फिर सुर्खियों में ला दिया है।इस मामले को लेकर अब कई अहम सवाल सामने आ रहे हैं। क्या मुख्यमंत्री धामी जेनी की मांग पर दोबारा सीबीआई जांच की संस्तुति करेंगे? क्या हरक सिंह रावत और जेनी के बेटे का डीएनए परीक्षण कराया जाएगा? क्या वर्षों पुराने इस प्रकरण की जांच में कोई नया तथ्य सामने आएगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या जेनी को न्याय मिल पाएगा?यह मामला केवल दो व्यक्तियों के बीच आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं है, बल्कि उस समय की सरकार, पुलिस की भूमिका, नारी निकेतन में जेनी के रहने की परिस्थितियों और जांच की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े करता है।

2002-03: कैसे शुरू हुआ था जेनी प्रकरण?

जेनी, जिन्हें इंदिरा देवी के नाम से भी जाना जाता है, मूल रूप से असम की रहने वाली हैं। उनका मामला पहली बार वर्ष 2003 में उत्तराखंड की राजनीति में चर्चा का विषय बना था।जेनी के अनुसार, वर्ष 2002 में वह देहरादून में एक एसटीडी बूथ पर काम करती थीं। उनका आरोप है कि एक व्यक्ति के माध्यम से उन्हें तत्कालीन मंत्री हरक सिंह रावत के यमुना कॉलोनी स्थित आवास पर ले जाया गया, जहां वह करीब डेढ़ से दो महीने तक रहीं।जेनी ने अब आरोप लगाया है कि उस समय उनकी उम्र महज 16 वर्ष थी और उनके साथ यौन शोषण हुआ। उनका कहना है कि वह गर्भवती हुईं और बाद में उन्हें नारी निकेतन भेज दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि छात्रावास में रखने की बात कहकर उन्हें ऐसी जगह रखा गया, जहां उनकी परिस्थितियां बेहद कठिन थीं।जेनी का दावा है कि जून 2003 में उन्होंने एक बेटे को जन्म दिया और बच्चे के पिता के रूप में हरक सिंह रावत का नाम लिया। इस घटनाक्रम ने उस समय प्रदेश की राजनीति में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया था।

तत्कालीन सरकार ने कराई थी सीबीआई जांच

उस समय उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी। जेनी के आरोप सामने आने के बाद मामला राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चा में आया। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने प्रकरण की सीबीआई जांच की संस्तुति की थी।जांच के दौरान बच्चे और हरक सिंह रावत के डीएनए नमूनों का परीक्षण कराया गया। उस समय सामने आई रिपोर्ट में दोनों के नमूनों का मिलान नहीं होने की बात कही गई थी। इसके बाद हरक सिंह रावत को इस मामले में क्लीन चिट मिल गई थी।इस विवाद के चलते हरक सिंह रावत को उस समय मंत्री पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था।यही वह पुराना घटनाक्रम है, जिसके आधार पर आज फिर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, जेनी अब पूर्व में हुई जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठा रही हैं। उनका दावा है कि जांच के दौरान उनसे ठीक तरीके से पूछताछ नहीं हुई और उनके अनुसार उनके तथा बच्चे से संबंधित नमूनों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई।

असम से देहरादून पहुंचीं जेनी,

डीजीपी को सौंपा शिकायती पत्रकरीब 23 साल बाद जेनी एक बार फिर सार्वजनिक रूप से सामने आई हैं। 7 नवंबर 2026 को देहरादून में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने अपने पुराने आरोप दोहराए और न्याय की मांग की।जेनी ने पुलिस महानिदेशक से मुलाकात कर शिकायती पत्र सौंपा। उन्होंने पूर्व मंत्री हरक सिंह रावत के खिलाफ कानूनी कार्रवाई, मामले की नए सिरे से जांच, बेटे के पितृत्व की वैज्ञानिक जांच और सुरक्षा उपलब्ध कराने की मांग की है।उनका कहना है कि उनका बेटा अब 23 वर्ष का हो चुका है। इतने वर्षों बाद भी उसकी पहचान और पिता के नाम से जुड़ा सवाल अनसुलझा है।जेनी ने आरोप लगाया कि सीबीआई के अधिकारी नारी निकेतन में उनसे केवल एक बार बातचीत करने पहुंचे थे। उस समय उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं थी और उनसे दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कराए गए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जब उनके अनुसार उनसे और उनके बेटे से आवश्यक नमूने नहीं लिए गए तो डीएनए जांच की रिपोर्ट किस आधार पर तैयार हुई?ये सभी जेनी के आरोप और दावे हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

हरक सिंह रावत ने आरोपों को नकारा

दूसरी ओर हरक सिंह रावत इस मामले में पहले भी आरोपों को नकारते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि जेनी उनके पास गर्भवती अवस्था में आई थीं और उन्होंने उनके साथ किसी तरह का गलत व्यवहार नहीं किया।पुराने मामले में सीबीआई की डीएनए रिपोर्ट को भी वह अपने पक्ष में आधार बताते रहे हैं। हरक सिंह रावत ने इस प्रकरण को राजनीतिक साजिश से जोड़कर भी देखा है।ऐसे में अब जेनी के नए आरोपों और पुराने सीबीआई निष्कर्षों के बीच एक बार फिर जांच की निष्पक्षता और उपलब्ध साक्ष्यों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। संबंधित पक्षों के सभी दावों की जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

धामी के बयान से दोबारा क्यों गरमाया मामला?

इस पूरे घटनाक्रम की राजनीतिक शुरुआत 24 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हल्द्वानी में दिए गए बयान से जुड़ी है।अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर कांग्रेस की ओर से निकाली जा रही यात्राओं और विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस नेताओं को जेनी प्रकरण की याद दिलाई थी। उन्होंने कहा था कि कांग्रेस को इस तरह के मुद्दों पर बोलने से पहले अपने नेताओं से जुड़े मामलों पर भी जवाब देना चाहिए।मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद हरक सिंह रावत ने भी पलटवार किया। उन्होंने जेनी प्रकरण को राजनीतिक साजिश बताते हुए भाजपा पर अंकिता भंडारी प्रकरण से ध्यान भटकाने का आरोप लगाया।इसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और हरक सिंह रावत के बीच भी बयानबाजी हुई। हरक सिंह ने महेंद्र भट्ट के डीएनए टेस्ट तक की बात कह दी थी।लेकिन अब कहानी में नया मोड़ आ गया है। जिस जेनी प्रकरण को लेकर राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे थे, उसी मामले की मुख्य महिला सामने आकर अपनी बात रख रही हैं।

पुलिस ने शुरू की जांच, महिला सीओ को मिली जिम्मेदारी

जेनी की शिकायत पर अब पुलिस स्तर पर कार्रवाई शुरू हो गई है।डीजीपी कार्यालय को दिए गए उनके शिकायती पत्र को देहरादून पुलिस को भेजा गया। एसएसपी प्रमेन्द्र सिंह डोबाल ने मामले की जांच डोईवाला की क्षेत्राधिकारी वंदना वर्मा को सौंपी है।अब पुलिस के सामने सबसे अहम जिम्मेदारी होगी कि वह जेनी के दावों, वर्ष 2003 की पुरानी जांच, उपलब्ध दस्तावेजों, मेडिकल रिकॉर्ड और सीबीआई की पूर्व रिपोर्ट का परीक्षण करे।यह भी स्पष्ट करना होगा कि पुराने मामले में किन-किन लोगों के बयान दर्ज किए गए थे और डीएनए परीक्षण की प्रक्रिया वास्तव में किस तरह पूरी हुई थी।

क्या दोबारा सीबीआई जांच और पितृत्व परीक्षण संभव है?

इस मामले में कानूनी पहलू भी महत्वपूर्ण है। सीबीआई पहले ही अपनी जांच पूरी कर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर चुकी थी। इसलिए केवल दोबारा मांग उठने से पुराना मामला अपने आप नहीं खुल जाएगा।कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, पुलिस प्रारंभिक जांच में नए और ठोस तथ्य सामने आने पर मामले को फिर से खोलने के लिए संबंधित सीबीआई अदालत के समक्ष प्रक्रिया आगे बढ़ा सकती है।इसी तरह बेटे के पितृत्व की जांच के लिए भी कानूनी प्रक्रिया और अदालत की अनुमति का सवाल महत्वपूर्ण होगा।यहां एक तकनीकी अंतर समझना जरूरी है। जेनी की मांग केवल सामान्य डीएनए जांच की नहीं, बल्कि बेटे के पितृत्व की पहचान स्थापित करने की है। इसे पितृत्व परीक्षण (Paternity Test) कहा जाता है।इसलिए यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि क्या पुराने परीक्षण के अतिरिक्त कोई नया वैज्ञानिक परीक्षण कानूनी रूप से कराया जा सकेगा। अंकिता

अंकिता भंडारी प्रकरण से जुड़ती राजनीतिक

बहसउत्तराखंड में अंकिता भंडारी हत्याकांड को लेकर राजनीतिक दलों के बीच लगातार बयानबाजी हो रही है। कांग्रेस इस मामले में सीबीआई जांच और न्याय की मांग को लेकर सरकार पर सवाल उठाती रही है।दूसरी ओर मुख्यमंत्री धामी ने कांग्रेस को जेनी प्रकरण की याद दिलाकर जवाब दिया था।अब जेनी के देहरादून पहुंचने और दोबारा जांच की मांग उठाने से दोनों मामलों को लेकर राजनीतिक बहस और तेज हो सकती है।हालांकि दोनों मामले अलग-अलग हैं और उनकी जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया भी अलग है। किसी एक मामले के आरोपों को दूसरे मामले की जांच का विकल्प नहीं बनाया जा सकता।जेनी के आरोपों की निष्पक्ष जांच और अंकिता भंडारी प्रकरण में न्याय—दोनों ही अपने-अपने स्तर पर महत्वपूर्ण जनहित के विषय हैं।

अब मुख्यमंत्री धामी के सामने क्या चुनौती है?

जेनी ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से मिलने और न्याय दिलाने की मांग की है। अब सरकार के सामने कई सवाल हैं।क्या सरकार जेनी की शिकायत पर निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करेगी?क्या पुराने सीबीआई रिकॉर्ड और डीएनए रिपोर्ट की दोबारा समीक्षा होगी?क्या नए तथ्यों के आधार पर सीबीआई जांच दोबारा खोलने की प्रक्रिया शुरू होगी?क्या बेटे के पितृत्व परीक्षण के लिए कानूनी रास्ता निकलेगा?क्या जेनी को सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया में उचित सहयोग मिलेगा?इन सवालों के जवाब पुलिस जांच, कानूनी प्रक्रिया और सरकार के अगले कदम से ही सामने आएंगे।

अरविन्द सिंह जयाड़ा का विश्लेषण

उत्तराखंड की राजनीति में जेनी प्रकरण का दोबारा सामने आना केवल पुरानी राजनीतिक बहस का लौटना नहीं है। इस बार जेनी स्वयं सामने आई हैं और उन्होंने अपनी शिकायत पुलिस महानिदेशक तक पहुंचाई है।एक तरफ हरक सिंह रावत पुराने सीबीआई निष्कर्षों और क्लीन चिट का हवाला दे रहे हैं, तो दूसरी तरफ जेनी पुरानी जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए नए सिरे से न्याय की मांग कर रही हैं।अब यह मामला केवल राजनीतिक बयानबाजी से आगे बढ़कर पुलिस और न्यायिक प्रक्रिया की कसौटी पर पहुंच गया है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या 23 साल पुराने इस प्रकरण में नए तथ्य सामने आएंगे? क्या जेनी के बेटे की पितृत्व संबंधी पहचान का सवाल कानूनी रूप से सुलझ पाएगा? और क्या मुख्यमंत्री धामी की ओर से उठाया गया यह राजनीतिक मुद्दा अब निष्पक्ष जांच तक पहुंचेगा?फिलहाल पुलिस जांच शुरू हो चुकी है। मुख्यमंत्री की ओर से सीबीआई जांच की नई संस्तुति या डीएनए परीक्षण को लेकर कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक नहीं हुआ है।आने वाले दिनों में इस मामले की जांच और सरकार का रुख उत्तराखंड की राजनीति में चर्चा का विषय बना रहेगा।

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