गढ़ देश न्यूज़ | विशेष राजनीतिक विश्लेषणरिपोर्ट: अरविन्द जयाड़ा
पुरोला विधानसभा की राजनीति में एक बार फिर “जन एकता” चर्चा के केंद्र में है। वर्ष 2017 में जिस जन आंदोलन ने राष्ट्रीय दलों को अपनी ताकत का एहसास कराया था, वही जन एकता मंच अब 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले फिर सक्रिय दिखाई दे रहा है। मोरी, देवरा और अन्य क्षेत्रों में हुई बैठकों तथा हालिया रैलियों ने यह संकेत दिया है कि आने वाले चुनाव में जन एकता की भूमिका को नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होगा।
राजनीतिक गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जन एकता मंच फिर से चुनावी समीकरण बदलने की स्थिति में है, या फिर यह केवल दबाव की राजनीति तक सीमित रहेगा?
2017: जब जन एकता ने दिखाया था अपना दम
रवांई क्षेत्र में लंबे समय से यह भावना रही कि मोरी क्षेत्र को राजनीतिक प्रतिनिधित्व और विकास के मामले में अपेक्षित महत्व नहीं मिला। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, सिंचाई, पेयजल और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर क्षेत्र में लगातार असंतोष था।इसी पृष्ठभूमि में जन एकता मंच का गठन हुआ। मंच के संयोजक चंद्रवीर सिंह रावत और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं ने क्षेत्रीय एकजुटता का अभियान शुरू किया। इसके बाद निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में दुर्गेश्वर लाल को मैदान में उतारा गया।दुर्गेश्वर लाल ने लगभग 17 हजार वोट हासिल कर यह साबित कर दिया कि यदि क्षेत्रीय एकता बनती है तो राष्ट्रीय दलों की राजनीति को चुनौती दी जा सकती है।
हालांकि उस चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी राजकुमार को जौनपुर क्षेत्र का व्यापक समर्थन मिला। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा प्रत्याशी मालचंद और संगठन के बीच तालमेल की कमी तथा क्षेत्रवाद की चर्चाओं ने भी कांग्रेस को लाभ पहुंचाया। परिणामस्वरूप राजकुमार चुनाव जीत गए, लेकिन जन एकता मंच एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरकर सामने आया।
2022: भाजपा ने खेला बड़ा दांव
2017 के चुनाव परिणामों ने भाजपा को यह संदेश दे दिया था कि जन एकता मंच की अनदेखी करना आसान नहीं होगा।इसी रणनीति के तहत 2022 में भाजपा ने जन एकता मंच से जुड़े चेहरे दुर्गेश्वर लाल को टिकट दिया। यह निर्णय भाजपा के लिए राजनीतिक रूप से सफल साबित हुआ और दुर्गेश्वर लाल विधायक निर्वाचित हुए।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा ने उस समय जन एकता की ताकत को अपने पक्ष में कर चुनावी बढ़त हासिल की थी।
वर्तमान विधायक के प्रति क्यों बढ़ रहा है असंतोष?
चार वर्ष के कार्यकाल के बाद वही जन एकता मंच अब वर्तमान विधायक दुर्गेश्वर लाल से दूरी बनाता दिखाई दे रहा है।हाल ही में मोरी और अन्य क्षेत्रों में आयोजित बैठकों में कई वक्ताओं ने विधायक के कार्यकाल पर सवाल उठाए। बैठकों में कथित रूप से जिन मुद्दों को उठाया गया, उनमें शामिल हैं—सड़क और मोटर मार्गों की बदहाल स्थितिपेयजल संकटसिंचाई नहरों की समस्याएंस्वास्थ्य सुविधाओं की कमीशिक्षा व्यवस्था की चुनौतियांजातिवाद की राजनीति के आरोपसालरा प्रकरण और विद्या मंदिर प्रकरण जैसे विवादित मुद्देहालांकि इन आरोपों पर विधायक पक्ष की विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है।
चंद्रवीर सिंह रावत का बयान बना राजनीतिक चर्चा का केंद्र
जन एकता मंच के सह-संयोजक एवं वरिष्ठ सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रवीर सिंह रावत द्वारा सार्वजनिक मंचों से विधायक से राजनीतिक दूरी बनाने की बात ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है।जन एकता मंच की बैठकों में भजनलाल आर्य को संभावित चेहरे के रूप में सामने लाए जाने की चर्चाओं ने भी सियासी तापमान बढ़ा दिया है।राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि जन एकता मंच पूरी मजबूती से किसी नए चेहरे के साथ खड़ा होता है तो उसका प्रभाव चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।
देवरा और मोरी की बैठकों ने बढ़ाई हलचल
मोरी के बाद देवरा में हुई बैठक और फिर मोरी में निकाली गई बड़ी रैली ने जन एकता मंच की सक्रियता को फिर चर्चा में ला दिया।स्थानीय स्तर पर दावा किया जा रहा है कि रैली में सैकड़ों लोगों ने भाग लिया। चाहे वास्तविक संख्या कुछ भी रही हो, लेकिन इस आयोजन ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को संदेश जरूर दिया है कि जन एकता मंच अभी पूरी तरह राजनीतिक परिदृश्य से बाहर नहीं हुआ है।सबसे बड़ी राजनीतिक चर्चा यह है कि जिस मंच ने दुर्गेश्वर लाल को राजनीति में स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, आज वही मंच उनसे दूरी बनाता दिखाई दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल:
क्या फिर बनेगी जन एकता “किंगमेकर”?राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जन एकता मंच के सामने अब अस्तित्व और प्रभाव दोनों का प्रश्न है।यदि मंच केवल बैठकों और प्रस्तावों तक सीमित रहता है तो उसका प्रभाव धीरे-धीरे कम हो सकता है। लेकिन यदि वह स्पष्ट राजनीतिक निर्णय लेता है तो 2027 के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।संभावित स्थितियां तीन हो सकती हैं—1. जन एकता खुद चुनाव लड़ेयदि भजनलाल आर्य या कोई अन्य उम्मीदवार जन एकता मंच के समर्थन से मैदान में उतरता है तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है।
2. भाजपा या कांग्रेस से समझौता2022 की तरह कोई दल जन एकता समर्थित चेहरे को टिकट देकर उसके जनाधार का लाभ लेने का प्रयास कर सकता है।
3. दबाव समूह की भूमिकामंच किसी राजनीतिक दल को समर्थन देकर विकास और क्षेत्रीय मुद्दों पर अपनी शर्तें लागू कराने का प्रयास कर सकता है।
भाजपा के सामने चुनौती
यदि जन एकता मंच भाजपा से पूरी तरह अलग रास्ता चुनता है तो भाजपा को नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाने होंगे।वर्तमान विधायक दुर्गेश्वर लाल, पूर्व विधायक मालचंद तथा अन्य दावेदारों के बीच संतुलन साधना आसान नहीं होगा।भाजपा के सामने यह भी चुनौती होगी कि क्या वह फिर 2022 जैसी रणनीति दोहरा पाएगी या इस बार नया चेहरा तलाशेगी।
कांग्रेस के लिए भी आसान नहीं राह
कांग्रेस के सामने भी बड़ा प्रश्न है।क्या पार्टी पारंपरिक नेतृत्व पर भरोसा करेगी या नए चेहरों को आगे लाएगी?कांग्रेस में बिहारी लाल शाह, हरिमोहन जुवाठा, रामलाल, मोहनलाल बुराठा और प्रकाश जैसे नाम चर्चा में हैं। वहीं युवा नेतृत्व की भी दावेदारी बढ़ रही है।
क्या युवाओं पर दांव लगाएंगी पार्टियां?
पुरोला विधानसभा में शम्मी बहुरियाण और सचिन कुमार जैसे युवा नामों की चर्चा भी लगातार बढ़ रही है।यदि भाजपा या कांग्रेस युवा चेहरे को मैदान में उतारती है तो मुकाबले की दिशा पूरी तरह बदल सकती है।उस स्थिति में चुनाव केवल पार्टी बनाम पार्टी नहीं बल्कि युवा बनाम अनुभव, विकास बनाम परंपरागत राजनीति और संगठन बनाम जनभावना का रूप ले सकता है।
भजनलाल आर्य: क्या बन सकते हैं नया राजनीतिक केंद्र?
भजनलाल आर्य का नाम जिस तेजी से जन एकता मंच के साथ जुड़ रहा है, उसने राजनीतिक चर्चाओं को नया आयाम दिया है।लेकिन राजनीति में भीड़ और वोट के बीच बड़ा अंतर होता है। किसी भी नेता की वास्तविक ताकत का आकलन बूथ स्तर के संगठन, पूरे विधानसभा क्षेत्र में स्वीकार्यता और मतदान के दिन प्राप्त समर्थन से ही होता है।फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि जन एकता मंच पूरी ताकत के साथ उनके पीछे खड़ा होता है तो वे 2027 की राजनीति में एक महत्वपूर्ण कारक बन सकते हैं।
निष्कर्ष: 2027 का चुनाव जन एकता के फैसले पर भी निर्भर करेगा
पुरोला विधानसभा की राजनीति में इस समय जितनी चर्चा भाजपा और कांग्रेस की नहीं है, उससे अधिक चर्चा जन एकता मंच की भूमिका को लेकर हो रही है।क्या जन एकता मंच फिर इतिहास दोहराएगा?क्या भाजपा एक बार फिर जन एकता समर्थित चेहरे पर दांव लगाएगी?क्या कांग्रेस 2022 की रणनीतिक गलतियों से सीखकर जन एकता के साथ संवाद बढ़ाएगी?
क्या युवा नेतृत्व को मौका मिलेगा?क्या भजनलाल आर्य एक बड़े क्षेत्रीय विकल्प के रूप में उभरेंगे?या फिर राष्ट्रीय दल अपने संगठनात्मक दमखम के बल पर चुनावी मैदान अपने पक्ष में मोड़ देंगे?इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में होने वाली राजनीतिक गतिविधियां तय करेंगी।एक बात तय है—
पुरोला विधानसभा का 2027 का चुनाव केवल दलों की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता, विकास, नेतृत्व और जनभावनाओं की भी परीक्षा होगा।
गढ़ देश न्यूज़ की नजर पुरोला विधानसभा की हर राजनीतिक हलचल पर बनी रहेगी।(यह एक राजनीतिक विश्लेषण है।
इसमें व्यक्त आकलन उपलब्ध चर्चाओं, स्थानीय राजनीतिक गतिविधियों और जनभावनाओं पर आधारित हैं।)
