न सड़क, न एंबुलेंस की पहुंच! नकोड़ा-कपोला गांव की तस्वीर ने जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर खड़े किए सवाल, पूर्व विधायक से लेकर वर्तमान विधायक तक जवाबदेही के घेरे में

2027 से पहले सड़क निर्माण शुरू नहीं हुआ तो ग्रामीणों ने आंदोलन और चुनाव बहिष्कार की चेतावनी दी

21वीं सदी में भी यदि किसी गांव में बीमार महिला को अस्पताल पहुंचाने के लिए प्लास्टिक की कुर्सी को डंडों से बांधकर सात किलोमीटर पैदल चलना पड़े, तो सवाल केवल सड़क का नहीं, बल्कि विकास की प्राथमिकताओं और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही का भी है।3 नवंबर की रात सामने आई बदहाल व्यवस्था की तस्वीरजानकारी के अनुसार, 3 नवंबर की रात करीब 10 बजे नकोड़ा-कपोला गांव निवासी मीना देवी (सुपुत्री बलबीर सिंह) की अचानक तबीयत बिगड़ गई। गांव तक सड़क नहीं होने के कारण एंबुलेंस या अन्य वाहन पहुंचने का कोई रास्ता नहीं था।ऐसे में ग्रामीणों ने प्लास्टिक की कुर्सी को डंडों के सहारे बांधकर अस्थायी पालकी तैयार की। टॉर्च और मोबाइल की रोशनी के सहारे दुर्गम और पथरीले रास्तों से करीब सात किलोमीटर पैदल चलकर महिला को मुख्य सड़क तक पहुंचाया गया। इसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया।यह दृश्य केवल एक परिवार की परेशानी नहीं, बल्कि उन ग्रामीणों की रोजमर्रा की चुनौती को सामने लाता है, जिनके लिए आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा तक पहुंचना भी संघर्ष बन चुका है।

हर एक-दो महीने में दोहराती है

परेशानीग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहली घटना नहीं है। गांव में किसी व्यक्ति की तबीयत बिगड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ने पर इसी तरह डंडी-कंडी का सहारा लेना पड़ता है।ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों, शासन और प्रशासन के सामने सड़क निर्माण की मांग रखी गई, लेकिन अब तक समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया। उनका कहना है कि चुनाव के दौरान सड़क निर्माण के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन चुनाव के बाद गांव की समस्या फिर पीछे छूट जाती है।पूर्व विधायक, प्रभारी और वर्तमान विधायक की कार्यशैली पर सवालनकोड़ा-कपोला गांव की यह स्थिति यमुनोत्री विधानसभा में विकास कार्यों की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर रही है। क्षेत्र में पूर्व विधायक, पार्टी के प्रभारी, मीडिया प्रभारियों और वर्तमान जनप्रतिनिधियों की भूमिका को लेकर भी ग्रामीणों के बीच सवाल उठ रहे हैं।वर्तमान विधायक संजय डोभाल के सामने भी ग्रामीणों की सड़क संबंधी मांग एक बड़ी चुनौती है। सवाल यह है कि आखिर वर्षों से सड़क की प्रतीक्षा कर रहे इन गांवों को कब राहत मिलेगी? क्या जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल चुनाव के दौरान गांवों तक पहुंचने तक सीमित है, या फिर ग्रामीणों की बुनियादी समस्याओं का समाधान भी उनकी प्राथमिकता में शामिल है?यह मामला किसी एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है। पूर्व में रहे जनप्रतिनिधियों से लेकर वर्तमान नेतृत्व तक, सभी के कार्यकाल और विकास के दावों की समीक्षा इस गांव की स्थिति के संदर्भ में होनी चाहिए।

स्थानीय निवासी महावीर पंवार ‘माही’ ने कहा

कि चुनाव के समय जनप्रतिनिधि गांव पहुंचकर बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद ग्रामीणों की समस्याओं पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता।उन्होंने कहा कि विकसित उत्तराखंड और विकसित भारत की बातों के बीच यदि ग्रामीणों को बीमार व्यक्ति को कुर्सी पर बैठाकर सात किलोमीटर पैदल ले जाना पड़े, तो यह व्यवस्था के सामने गंभीर सवाल है।2027 से पहले सड़क नहीं बनी तो आंदोलनग्रामीणों ने शासन-प्रशासन और क्षेत्रीय विधायक से नकोड़ा-कपोला गांव को सड़क सुविधा से जोड़ने की मांग की है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले सड़क निर्माण का कार्य धरातल पर शुरू नहीं हुआ, तो ग्रामीण एकजुट होकर जुलूस, धरना-प्रदर्शन और व्यापक आंदोलन करेंगे। साथ ही चुनाव बहिष्कार का रास्ता अपनाने की भी चेतावनी दी है।इस दौरान प्रदीप राणा, रोहित, सतपाल, पवन, नवीन, विपिन, खुशपाल, विजयपाल राणा, दीपक, मनवीर सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे।

बड़ा सवाल : क्या यही है यमुनोत्री विधानसभा का विकास?आखिर नकोड़ा-कपोला गांव आज तक सड़क सुविधा से क्यों वंचित है?बीमार और गर्भवती महिलाओं के लिए आपातकालीन स्वास्थ्य सुविधा की क्या व्यवस्था है?पूर्व जनप्रतिनिधियों के कार्यकाल में सड़क निर्माण की मांग पर क्या कार्रवाई हुई?वर्तमान विधायक और शासन इस समस्या के समाधान के लिए क्या ठोस कदम उठा रहे हैं?

क्या 2027 से पहले ग्रामीणों को सड़क की सौगात मिलेगी

या फिर एक बार और आश्वासन ही मिलेंगे?

गढ़ देश न्यूज़ का सवाल:

विकास का मूल्यांकन केवल घोषणाओं और सरकारी आंकड़ों से नहीं, बल्कि गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंची सुविधाओं से होना चाहिए। नकोड़ा-कपोला की यह तस्वीर यमुनोत्री विधानसभा के विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। अब देखना होगा कि जिम्मेदार जनप्रतिनिधि इन सवालों का जवाब देते हैं या ग्रामीणों को एक बार फिर इंतजार करना पड़ेगा।

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