उत्तराखंड में विधानसभा सीटों की संख्या 70 से बढ़ाकर 105 करने की चर्चा के बीच अब एक नई मांग जोर पकड़ने लगी है। सामाजिक संगठनों, बुद्धिजीवियों और आम नागरिकों का कहना है कि राज्य में विधायक बढ़ाने के बजाय छोटे-छोटे जिले बनाए जाएं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था मजबूत हो और विकास सीधे गांव तक पहुंचे।
🔸 “नेताओं की फौज नहीं, मजबूत प्रशासन चाहिए”जनता का कहना है कि सीटें बढ़ाने से नेताओं की संख्या, वेतन, पेंशन और सुविधाओं पर खर्च बढ़ेगा, जबकि इसका सीधा लाभ आम जनता को सीमित ही मिलेगा।
👉 वर्तमान गणना के अनुसार—एक विधायक को लगभग ₹85,000 मासिक पेंशन105 विधायकों पर ₹10 करोड़ से अधिक वार्षिक पेंशन खर्चवेतन, आवास, वाहन, बिजली-पानी सहित कुल खर्च
👉 ₹20–30 लाख प्रति विधायक प्रतिवर्ष (अनुमानित)
➡️ कुल मिलाकर यह खर्च हर साल ₹20 से 30 करोड़ से अधिक तक पहुंच सकता है।
🔸 दीर्घकाल में बढ़ेगा आर्थिक बोझविशेषज्ञों का मानना है कि यदि हर पांच वर्ष में 105 विधायक चुने जाते हैं, तो आने वाले वर्षों में पेंशनधारकों की संख्या लगातार बढ़ेगी।
👉 15 वर्षों में यह संख्या सैकड़ों तक पहुंच सकती है, जिससे राज्य पर स्थायी वित्तीय दबाव बढ़ेगा।
🔸 “छोटे जिले—सीधा विकास”लोगों का कहना है कि यदि इसी धन का उपयोग नए जिलों के गठन में किया जाए, तो—
✔ हर जिले में कलेक्ट्रेट, अस्पताल और प्रशासनिक कार्यालय
✔ गांवों तक तेज़ी से सरकारी सेवाओं की पहुंच
✔ शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के बेहतर अवसर
✔ पहाड़ी क्षेत्रों में दूरी और दुर्गमता की समस्या का समाधान
🔸 पर्वतीय राज्य के लिए अलग विकास मॉडल जरूरीउत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए लोगों का कहना है कि यहां विकास का मॉडल मैदानी राज्यों जैसा नहीं हो सकता।
👉 “यहां जनसंख्या नहीं, दूरी और दुर्गमता के आधार पर योजनाएं बननी चाहिए।”
🔸 जनता की स्पष्ट राय“हमें नेता नहीं, सुविधा चाहिए”“जिला बनेगा तो काम होगा”“पेंशन पर नहीं, विकास पर खर्च हो”
🔻 निष्कर्ष:उत्तराखंड में बढ़ती यह मांग साफ संकेत दे रही है कि जनता अब केवल राजनीतिक विस्तार नहीं, बल्कि जमीनी विकास और मजबूत प्रशासनिक ढांचे को प्राथमिकता देना चाहती है।
