विधानसभा सत्र -विपक्ष भी सत्ता सुख का साझेदार, जनता के सरोकार हाशिए पर

विधानसभा सत्र : सत्ता–विपक्ष की मिलीभगत से जनता के मुद्दे हाशिए परगैरसैंण।

उत्तराखंड विधानसभा के गैरसैंण सत्र में जिस उम्मीद के साथ जनता की नज़रें टिकी थीं, वह पूरी तरह से धूमिल हो गईं। सत्ता पक्ष और विपक्ष की टकराहट ने इस बार भी सदन की कार्यवाही को ठप कर दिया। परिणामस्वरूप बेरोजगारी, नियुक्ति संकट, मूल निवास, आपदा प्रबंधन और जनहित के अहम मुद्दे बहस के लिए उठ ही नहीं पाए।

सत्र न चलने से विपक्ष ने दरअसल सत्ता पक्ष का काम और आसान कर दिया। विपक्ष को जहाँ जनता की आवाज़ बनकर प्रदेश के क्षेत्रीय मुद्दों पर सरकार को घेरना चाहिए था, वहीं वे केवल हंगामा कर सत्र स्थगित करने पर अड़े रहे। यही तो सत्ता पक्ष चाहता था — और विपक्ष ने उसी पर मुहर लगा दी।

प्रदेश में हालात यह हैं कि चयनित बेरोजगार 125 दिन से नियुक्ति की मांग को लेकर धरने पर बैठे हैं, लेकिन उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। भर्ती प्रक्रियाएँ लगातार कोर्ट में अटकी हुई हैं — “डेट पर डेट” मिल रही है,

जबकि पंचायत चुनावों में तीन दिन के भीतर अदालत का स्टे हटा दिया गया था। सवाल उठता है कि जब परीक्षा सरकार कराती है, विज्ञापन सरकार निकालती है, रिजल्ट सरकार घोषित करती है, तो फिर नियुक्ति कोर्ट की दहलीज पर क्यों टंगी रहती है?

धराली आपदा जैसे ताज़ा मामले, प्रदेश में जारी लूट-खसोट, मूलनिवास के सवाल और युवाओं का पलायन — ये सब बड़े जनहित के विषय सत्र की कार्यवाही में गुम हो गए।

जनता के लिए जरूरी बहसें दरकिनार कर दी गईं और सदन की ऊर्जा केवल सत्ता–विपक्ष की रस्साकशी में जाया होती रही।राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है।

कि इस पूरे घटनाक्रम से यह संदेश गया कि विपक्ष भी कहीं न कहीं सत्ता सुख का हिस्सा बन चुका है। जनता के सरोकार गौण हैं और सत्ता की राजनीति ही प्राथमिकता बन चुकी है।अब सवाल यही है कि जनता के असली मुद्दे — बेरोजगारी, चयनित युवाओं की नियुक्ति, आपदा प्रबंधन और जनकल्याण योजनाएँ — सदन की दीवारों से बाहर आकर कब सुनी जाएँगी?

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