मोरी (उत्तरकाशी)।
स्वच्छ भारत मिशन और खुले में शौच मुक्त भारत के सरकारी दावों के बीच मोरी बाजार क्षेत्र में निर्मित सार्वजनिक शौचालय का तोड़ा जाना अब केवल एक निर्माण हटाने की कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक समन्वय और जनहित की प्राथमिकताओं पर बड़ा सवाल बनकर सामने आया है।
जिला पंचायत सदस्य पवन दास (भाजपा) द्वारा अपने जिला पंचायत बजट से आम जनता की वर्षों पुरानी मांग को देखते हुए इस शौचालय का निर्माण कराया गया था। लेकिन वन भूमि बताकर की गई वन विभागीय कार्रवाई के बाद शौचालय को ध्वस्त कर दिया गया, जिससे क्षेत्र में नाराज़गी, असमंजस और आक्रोश की स्थिति बनी हुई है। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरे घटनाक्रम पर अधिकांश जनप्रतिनिधि मौन दिखाई दिए।—
❓ क्या अब विधायक पहल करेंगी?
अब मोरी की जनता के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुरोला विधायक दुर्गेश्वर लाल क्या इस बुनियादी जनसमस्या को लेकर
👉 वन मंत्री सुबोध उनियाल से सीधे वार्ता करेंगी?और यदि यह वार्ता सफल नहीं होती है, तो क्या वे —अपने ही मंत्री के समक्ष जनहित में धरना या विरोध दर्ज करेंगे, या मुख्यमंत्री से मिलकर मोरी के लिए सार्वजनिक शौचालय निर्माण के स्पष्ट निर्देश दिलवाएंगे ?साथ ही जनता यह भी जानना चाहती है कि क्या इस मुद्दे पर विधायक अपने सोशल मीडिया या सार्वजनिक मंच से मोरी की जनता को कोई स्पष्ट आश्वासन देंगे या नहीं?—❓
जब सरकार भी भाजपा की, जनप्रतिनिधि भी भाजपा के — फिर विरोध क्यों?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास यही बनता है कि —
केंद्र में भाजपा सरकार राज्य में
भाजपा सरकार जिला पंचायत अध्यक्ष भाजपा से
जिला पंचायत सदस्य भाजपा से
मोरी ब्लॉक प्रमुख भाजपा से
उसके बावजूद मोरी जैसे संवेदनशील और भीड़भाड़ वाले क्षेत्र में सार्वजनिक शौचालय जैसे मूलभूत विषय पर समन्वय क्यों नहीं बन पाया?
सवाल यह भी है कि
👉 क्या जिला पंचायत सदस्य पवन दास द्वारा उठाई गई मांग गलत थी?
👉 या फिर जनहित के इस प्रयास को राजनीतिक उदासीनता का सामना करना पड़ा?
स्थानीय लोगों का कहना है
कि मोरी बाजार में सार्वजनिक शौचालय की मांग वर्षों से उठती आ रही थी। इसके प्रस्ताव कई बार संबंधित विभागों और जनप्रतिनिधियों तक पहुंचाए गए, लेकिन ठोस समाधान नहीं निकला। जब एक जनप्रतिनिधि ने अपने स्तर से पहल की, तो वही पहल विवादों में घिर गई।
—🌲 वन भूमि का तर्क और चयनात्मक कार्रवाई?
वन विभाग की ओर से शौचालय को वन भूमि पर अतिक्रमण बताते हुए कार्रवाई की गई।लेकिन क्षेत्र में यह सवाल भी जोर पकड़ रहा है कि —जब मोरी क्षेत्र में पहले से ही कई निर्माण वन भूमि पर मौजूद बताए जाते हैं,तो कार्रवाई केवल शौचालय पर ही क्यों की गई?यदि वन भूमि पर निर्माण ही समस्या थी, तो
👉 लैंड ट्रांसफर की प्रक्रिया क्यों नहीं अपनाई गई?
👉 क्या वन विभाग और जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय बैठक कर समाधान नहीं निकाला जा सकता था?
स्थानीय लोगों का मानना है कि यदि भूमि को लेकर आपत्ति थी, तोवैकल्पिक भूमि चिन्हित कर शौचालय को स्थानांतरित किया जा सकता था, न कि जनसुविधा से जुड़े निर्माण को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जाए।—
🤝 सहयोग क्यों नहीं मिला?इस पूरे घटनाक्रम में यह भी सामने आया कि —मोरी ब्लॉक प्रमुख,क्षेत्रीय विधायक,प्रधान और क्षेत्र पंचायत सदस्य में से किसी ने भी सार्वजनिक रूप से जिला पंचायत सदस्य पवन दास के प्रयास का समर्थन नहीं किया।इस चुप्पी ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या मोरी में जनहित से अधिक राजनीतिक समीकरण हावी हैं?
—🗣️ “मुझे श्रेय नहीं, सुविधा चाहिए” — पवन दास
इस मामले पर जिला पंचायत सदस्य पवन दास का कहना है —> “मुझे किसी भी प्रकार के श्रेय से कोई मतलब नहीं है। मेरे क्षेत्र में रोज़ाना हजारों लोग पहुंचते हैं। महिलाओं, बुजुर्गों और यात्रियों के लिए सुलभ शौचालय बेहद ज़रूरी है। मेरा उद्देश्य सिर्फ जनसुविधा है।”इसके बावजूद यह सवाल बना हुआ है कि आखिर किन कारणों से शौचालय निर्माण का विरोध हुआ और क्यों यह जनहित का कार्य आगे नहीं बढ़ पाया?—
⚖️ कानून बनाम अनावश्यकता यदि शौचालय निर्माण कानून के विरुद्ध था, तो यह भी तय किया जाना चाहिए कि —
क्या शौचालय की मांग ही गलत थी?
क्या स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधा के लिए वर्षों से उठती आवाज़ को अनदेखा किया जा सकता है?जनता यह समझना चाहती है कि कानून का पालन आवश्यक है,लेकिन क्या कानून के भीतर समाधान खोजने की जिम्मेदारी शासन–प्रशासन की नहीं बनती?—
🗣️ जनता सीधी अपील
👉 क्या मोरी में सार्वजनिक शौचालय की आवश्यकता है या नहीं?👉 यदि है, तो क्या सभी जनप्रतिनिधियों को मिलकर इसके लिए वैध भूमि और स्थायी समाधान नहीं निकालना चाहिए?
👉 क्या राजनीति से ऊपर उठकर स्वच्छता और सुविधा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए?
मोरी की जनता, व्यापारी वर्ग, महिलाएं और यात्री अब यह तय करें कि जनहित की आवाज़ को दबने दिया जाए या उसे मजबूती से उठाया जाए।
